वह धीरे-धीरे आया

वह धीरे-धीरे आया
सधे पैरों से चला गया ।

किसी ने उसको छुआ नहीं ।
उस असंग को अटकाने को
कोई कर न उठा ।

उस की आँखें रहीं देखती सब-कुछ
सब-कुछ को वात्सल्य-भाव से सहलाती, असीसती,
पर ऐसे, कि अयाना है सब-कुछ, शिशुवत अबोध ।
अटकी नहीं दीठ वह,
जैसे तृण-तरु को छूती प्रभात की धूप
दीठ भी आगे चली गई ।

आगे, दूर, पार, आगे को,
जहाँ और भी एक असंग सधा बैठा है,
जिस की दीठ देखती सब-कुछ,
सब-कुछ को सहलाती, दुलराती, असीसती,
-उस को भी, शिशुवत‍ अबोध को मानो-
किंतु अटकती नहीं, चली जाती है और आगे ।

आगे ?
हाँ, आगे, पर
उस से आगे सब आयाम
घूम-घूम जाते हैं चक्राकार,
उसी तक लौट
समाहित हो जाते हैं ।

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