तुम्हे पढ़ना नहीं आया

जिंदगी की क़िताब कुछ बिखरने सी लगी है
बेचने की ख़ातिर इसे मुझे मढ़ना नहीं आया ||

लोग कहते है कि मुझे पत्थर गढ़ना नहीं आया
तुम्हे क्या ख़ाक लिखता तुम्हे पढ़ना नहीं आया ||

खुद से ही लड़ता रहा खुद की ही ख़ातिर में
तुम्हारे लिए ज़माने से मुझे लड़ना नहीं आया ||

मेरे साथ और लोग थे सब आगे निकल गए
मै अब तक वही हूँ मुझे बढ़ना नहीं आया ||

10 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 12/10/2017
    • shivdutt 12/10/2017
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 12/10/2017
    • shivdutt 13/10/2017
  3. ANU MAHESHWARI Anu Maheshwari 12/10/2017
  4. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 13/10/2017
  5. md. juber husain md. juber husain 13/10/2017

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