आत्म-मंथन -प्रशान्त तिवारी

सूरज ढलने से पहले जब घोर अंधेरा होता है,
भय लगता है मन में और बादल सा उमड़ जाता है।
दूर दृष्टी से देखा जिसको नयनों ने पुलकित होकर,
पास पहुँचकर देखा तो बस बिंब नजर आता है।

नजर पड़ी ज्यों उन्मादों पर नई उम्मीद जगाता है,
धरे हुये कागजादों से धूल उड़ा जाता है।
वक्त गुजरता है जैसे फिर धूँधलापन छा जाता है,
विचार विलुप्त होते और ईद का चाँद नजर आता है।

खुद को वर्णित करना भी अब आतिश्योक्ती लगती है,
अथक तपों की बावजूद भी आत्मतृप्ती नहीं होती हैैं।
चूँक अवसरों को मन ये ऐंठ-ऐंठ रह जाता है,
अंतर्मुखी लगुँ पर हृदय में करुण भाव बहती है।

जब-जब कदम बढ़ाता हूँ कुछ भी हाथ न आता है,
पछतावा भी अब तो सब को छलावा ही लगता है।
इसके इतर भी कुछ सपने अपने भी मन में होते है,
काश! कोई समझे अब तो यह भी सवाल लगता है।

12 Comments

  1. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad sharma 08/10/2017
    • प्रशान्त तिवारी प्रशान्त तिवारी 08/10/2017
  2. Madhu tiwari Madhu tiwari 08/10/2017
    • प्रशान्त तिवारी प्रशान्त तिवारी 08/10/2017
  3. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 09/10/2017
    • प्रशान्त तिवारी प्रशान्त तिवारी 09/10/2017
  4. C.M. Sharma C.M. Sharma 09/10/2017
    • प्रशान्त तिवारी प्रशान्त तिवारी 09/10/2017
  5. Arun Kant Shukla अरुण कान्त शुक्ला 09/10/2017
    • प्रशान्त तिवारी प्रशान्त तिवारी 09/10/2017
  6. SALIM RAZA REWA SALIM RAZA REWA 09/10/2017
    • प्रशान्त तिवारी प्रशान्त तिवारी 09/10/2017

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