फर्क — डी के निवातिया

फर्क

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मै भी तो जर्रा हूँ उस बनौरी का
जिसके सदा तुम सजदे करते हो !
क्या फर्क है उसमें और मुझमे
उसे शिखर, मुझे तलवे रखते हो !!
!
हम शौक रखते नायाब नगीनो का
हर पत्थर को दिल कि हवेली नहीं रखते !
बेशकीमती होता है हर तराशा पत्थर
टूटी तो हम मूरत ईश की भी नहीं रखते !!
!
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!
डी के निवातिया

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6 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 07/10/2017
  2. Madhu tiwari Madhu tiwari 07/10/2017
  3. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad sharma 07/10/2017
  4. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 08/10/2017
  5. sarvajit singh sarvajit singh 08/10/2017
  6. C.M. Sharma C.M. Sharma 09/10/2017

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