ग़ज़ल : हुस्न-ए-जाना लब की लाली – सलीम रज़ा रीवा

..
हुस्न-ए-जाना लब की लाली रंग धानी फिर कहाँ
वो नहीं तो ग़ुंचा-ओ -गुल रात रानी फिर कहाँ
..
दोस्तों संग खेलना छुपना दरख़्तों के तले
वो सुहानें पल कहाँ यादें सुहानी फिर कहाँ
..
थपथपाकर गुनगुनाकर मुझको बहलाती सदा
खो गईं वो लोरिया अब वो कहानी फिर कहाँ
..
तेरी बाँहों में गुज़रते थे हसीं जो रात दिन
बिन तेरे खुशियों भरी वो जिंदगानी फिर कहाँ
..
पेंड बरगद का घना जो छाँव देता था सदा
गांव में मिट्टी का घर छप्पर वो छानी फिर कहाँ
..
खो गया बचपन जवानी औ बुढ़ापा आ गया
अब न लौटेगा वो बचपन वो जवानी फिर कहाँ
……………gazal by salim raza rewa
2122 2122 2122 212
बहरे रमल मुसम्मन महज़ूफ़

16 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 04/10/2017
  2. SALIM RAZA REWA SALIM RAZA REWA 04/10/2017
  3. C.M. Sharma C.M. Sharma 05/10/2017
  4. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar Prasad sharma 05/10/2017
  5. SALIM RAZA REWA SALIM RAZA REWA 05/10/2017
  6. SALIM RAZA REWA SALIM RAZA REWA 05/10/2017
  7. SALIM RAZA REWA SALIM RAZA REWA 05/10/2017
  8. SALIM RAZA REWA SALIM RAZA REWA 05/10/2017
  9. ANU MAHESHWARI Anu Maheshwari 05/10/2017
  10. SALIM RAZA REWA SALIM RAZA REWA 05/10/2017
  11. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 06/10/2017
  12. SALIM RAZA REWA SALIM RAZA REWA 06/10/2017
  13. SALIM RAZA REWA SALIM RAZA REWA 06/10/2017
  14. sarvajit singh sarvajit singh 06/10/2017
    • SALIM RAZA REWA SALIM RAZA REWA 07/10/2017

Leave a Reply