कुछ शब्द यूँ ही

१.गिरा दो ये इमारतें बंदिश की,रूह का लगाव इस जिस्म से अब सहा नहीं जाता।
जलने दो रिवाजों के इस जर्जर मकान को धूँ धूँ करके ,जाहिलों की बस्ती में अब रहा नही जाता।।

२.गुरूर का ये घरौंदा बड़ा ही मजबूत निकला।
खुदगर्जी की दीवारें एक एक कर सब ढह गई, पर ये नही
हिला ज़रा सा भी।।

३.बूँद बूँद रिसती हैं यादें ,जैसे स्याही में हों लिपटी।
कभी कहानी बन कागज़ पे बिखरी तो कभी कांटा बन मन में चुभती हैं ये यादें।।

४.सच क्या है?
जुबाँ है जो बोलती या आँखे हैे जो देखती।
या सच वो है जो सच तो है पर तेरा या मेरा सच नहीं।
या फिर वो सच है जो सच होकर भी सच नहीं।

 

6 Comments

  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 04/10/2017
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 04/10/2017
  3. C.M. Sharma C.M. Sharma 05/10/2017
  4. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar Prasad sharma 05/10/2017
  5. ANU MAHESHWARI Anu Maheshwari 05/10/2017

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