अपनों के लिए

शीर्षक –अपनों के लिए
सांझ अभी हुई नहीं
तारो का चमकना बांकी है
रात के आगोश से निकलकर
सूरज का निकलना बांकी है
जीते तो सभी है यहाँ
अपनों के लिए मरना बांकी है
गंगा जैसी है जो हमारी माँ
चूल्हे में जो धुँआ हुई
जो अकेले दुनिया से लड़ी
हाथ जला कर जो सेकती है रोटियाँ
जो हममे देखती अपनी दुनिया
उस माँ के लिए
रोटी सेकना बांकी है
उनका आसरा बनना बांकी है
सूरज अभी ढला नहीं
चाँद अपनी चांदनी में डूबा नहीं
अपनो के लिए
जीना मरना बांकी है
जो परछाई बन कर सदा चले
जिनके गोद में बैठ मेले देखे
जिसने सारे चाहते पूरे किए
जो हमारे लिए रात भर जगे
उस पिता के लिए
उनके आँखों की रौशनी बनना बांकी है
कुछ राते उनके लिए जगना बांकी है
उनके बुढ़ापे की लाठी बनना बांकी है
अपनों के लिए
अभी जीना -मरना बांकी है—अभिषेक राजहंस

3 Comments

  1. Madhu tiwari Madhu tiwari 01/10/2017
  2. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 01/10/2017
  3. C.M. Sharma C.M. Sharma 01/10/2017

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