अच्छा है…! (अतिरिक्त)

प्रस्तुत कविता मेरे द्वारा पूर्व में “हिन्दी साहित्य” में प्रकाशित की गयी कविता “अच्छा है…!” से प्रेरित है और एक साथ दोनों ही बेहतर अर्थ प्रदान करती हैं, कृपया समय निकाल कर अच्छा है…! कविता भी पढ़ने का प्रयत्न करें।

कभी-कभी जब दुनिया भर के,
नियम अनोखे हो जाते हैं।
तब उन सब रस्मों-नियमों को,
तोड़ भुलाना अच्छा है॥

जब अपना अतीत याद कर,
नज़रें हल्की झुक जाती हैं।
तब-तब अपने वर्तमान से,
नज़र मिलाना अच्छा है॥

ख़्वाबों की दुनिया में बस,
अब तेरी बातें होती हैं।
शायद तुझसे ख़्वाबों में ही,
सब कह जाना अच्छा है॥

तू जहाँ-जहाँ भी जाती है,
अपनी ख़ुशबू दे जाती है।
तेरा मुझसे मिलकर, मुझको
भी महकाना अच्छा है॥

यादों से तेरी बचते-छुपते,
मेरे दिन ढलते हैं।
निशा में आ तेरा मुझ पर,
कब्ज़ा कर जाना अच्छा है॥

दुनिया के सम्मुख अपना दु:ख,
कहने से डर लगता है।
ना समझे कोई इस खातिर,
बात बनाना अच्छा है॥

‘भोर’ देख कर बीते दिन की,
बात भुलाना अच्छा है।
कुछ लम्हों को देख के यूँ ही,
नज़र चुराना अच्छा है॥

©प्रभात सिंह राणा ‘भोर’

अन्य कविताओं हेतु www.bhorabhivyakti.tk पर जाएँ…

featured image – Wall 1

8 Comments

  1. Madhu tiwari Madhu tiwari 01/10/2017
  2. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 01/10/2017
  3. C.M. Sharma C.M. Sharma 01/10/2017

Leave a Reply