तू नहीं कहेगा ?

तू नहीं कहेगा ?
मैं फिर भी सुन ही लूँगा ।

किरण भोर की पहली भोलेपन से बतलावेगी,
झरना शिशु-सा अनजान उसे दुहरावेगा,
घोंघा गीली पीली रेती पर धीरे-धीरे आँकेगा,
पत्तों का मर्मर कनबतियों में जहाँ-तहाँ फ़ैलावेगा,
पंछी की तीखी कूक फरहरे-मढ़े शल्य-सी आसमान पर
टाँकेगी,
फिर दिन सहसा खुल कर उस को सब पर प्रकटावेगा,
निर्मम प्रकाश से सब कुछ पर सुलझा सब कुछ लिख जावेगा ।

मैं गुन लूँगा ।
तू नहीं कहेगा ?
आस्था है,
नहीं अनमना हूँगा तब-
मैं सुन लूँगा ।

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