जीवन सफ़र का यह कौन सा मोड़ आया

प्रभु! मेरे जीवन सफर का यह कौन सा मोड़ आया
विषैला व्याल बन मेरे पाँवों को डँसता दूर्वा
फूलों की डालियाँ ज्वालामुखी बन झूलतीं
घूर्णियाँ चिनगारी की खंडपत्ती- सी हवा में नाचतीं
पाँवों के नीचे की धरती धँसती जा रही
ऊपर घनघोर रव से व्योम फटा जा रहा
देखकर , सिंधु -सा फैला , भग्न आशा का अम्बार
प्राण संचित अग्नि,अधर से बाहर आने उधम मचा रहा
प्रभु ! मेरे जीवन का यह कौन सा मोड़ आया

नभ धरा के बीच, दुखता है अब जीवन मेरा
भ्रमित शून्य में उल्का – सा घूमता हूँ मैं अकेला
प्राणों के उलझन को सुलझा मानकर ,जीता हूँ मैं हारा
विधाता की कल्याणी सृष्टि, मैं भी यही चाहता
तुम पूर्णरूपेण सफल हो , इस भूतल पर
तुम्हारी कृति अनिल, भू –जल में बंद रहे सदा
मगर क्षितिज में सृष्टि बनी, स्मृति की संचित छाया से
मानव मन को मिलता विश्राम कहाँ,यहाँ तुम्हारे अंतर के
गुह्य में छिपे रहस्य को बता सकता, कौन यहाँ

मेरी अपलक आँखें , पदाग्र विलोकन करतीं
पथ – प्रदर्शिका बन चलतीं धीरे – धीरे
पाँवों के छाले ढुल – ढुलकर , फट-फटकर बहे जा रहे
खुले नयन चमकते हैं मेरे , ज्यों शिला हों दो अनगढे
इतना निष्ठुर न बन प्रभु, देखो रत्नाकर हृदय उलीच रहा
जो कराह रहा है खाट पकड़कर,वह तुम्हीं को पुकार रहा

मेरा हिमगिरि हृदय , गल – गलकर सरिता की
शीतल धारा बन जिसके लिए बहता आया
जिसकी आवाज गुंजती थी , दिव्य रागिनी -सी
जो मेरी नजरों को शांत मंगल -सा दीखता रहा
वह अनंत के अमूर्त प्रांत से नहीं है आया
वह तो मेरे जीवन जलधि से मुक्ता बन है निकला
जिसके लिए मंगल गान कर मैं नहीं था थकता
आज वही शोक की छाया बन, मेरे संग है रहता

राह भी वही पुराना, पथिक भी मैं वही पुराना
फिर भी पथ नहीं सूझता,यह तुम्हारा कैसा करिश्मा
यह तुम्हारा कैसा रूप नया,जिसमें न माया,न करुणा
गली – गली में सुख सेज बिछी है, उगी धूप भी है
कानन – कानन में फूटे रंग, गुलाबी ,बसंती भी हैं
मगर मेरा लहराता कानन , कैसे सूख गया
दाग – दाग कुल अंग भर गया, स्याह कैसे हो गया

मैं मानता हूँ, विश्व बंधा है प्रकृति के नियमों से
परिवर्तन प्रक्रिया , प्रकृति की सहज प्राण -धारा है
परिवर्तन ही विनाश है,किन्तु परिवर्तन नाश नहीं है
नाश में सृजनता रहती छिपी हुई, क्षण-क्षण परिवर्तित
दुनिया का कोई आकार नहीं होता ,इसी परिवर्तन के
क्रम में , मेरे हृदय वेदना की मूर्तियाँ भी बनतीं
नित नई , जिसमें नूतनता नाचती होकर नंगी

सोचता हूँ , पंचतंत्र की रचना में भ्रमण करने
तुमने एक और तत्व , अभिलाषा को क्यों भरा
वारिद में तड़ित को भरा , दारू में अनल को
फूलों में सुरभि को भरा , सुरभि में विकल को
यह वृथा प्रणय की अमर साध तुमने क्यों दिया
मानव चेतना के पट से, अपनी स्मृति की शाश्वत छाप
हटाकर हृदय दाह करने,प्राणों में व्याकुलता क्यों भर दिया

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