मैं जिन्दा रहता हूँ

शीर्षक–मैं जिंदा रहता हूँ
सूरज की पहली किरण
जब रोशनदान से
चेहरे पर पड़ती है
मैं आँखे मीचते हुए
बिस्तर से उठ जाता हूँ
पिताजी के संग लॉन में
अखबार पढने बैठ जाता हूँ
पिताजी शहर में होते हादसे पे अफ़सोस जताते है
ज़िन्दगी में बढ़ते तकनीक पर
व्यंग्य बाण छोड़ते हैं
सहसा वार्तालाप टूटता है
माँ हाथों में चाय लिए
सामने होती है
बीबी टिफ़िन का डब्बा लिए
दरवाजे तक छोड़ने आती है
प्यारी बिटिया को स्कूल छोड़ते हुए
ऑफिस की तरफ जाता हूँ
कभी बस कभी ट्रेन में धक्के खाता हूँ
मुझसे है मेरा परिवार
माँ पिताजी का भरोसा
पत्नी का विश्वास
बेटी की उम्मीद
सब मैं ही तो हूँ
ये सब सोचते हुए मैं जाता रहता हूँ
हादसों के शहर में जीने का ठिकाना नहीं
साँसे लेने का बहाना नहीं
हर शाम जिन्दा होता हूँ
मेरे बाद कैसे चलेगा परिवार
इस बात से डरा करता हूँ
मौत के इंतज़ार में
ज़िन्दगी का बीमा करवा लेता हूँ
हादसों के शहर में
करवटो के संग साँसे टूट जाती है
मौत के इंतज़ार में
ज़िन्दगी से डरा करता हूँ—अभिषेक राजहंस

7 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 23/09/2017
    • Abhishek Rajhans 24/09/2017
  2. sarvajit singh sarvajit singh 23/09/2017
  3. Arun Kant Shukla Arun Kant Shukla 24/09/2017
  4. C.M. Sharma C.M. Sharma 25/09/2017
  5. Madhu tiwari Madhu tiwari 25/09/2017
  6. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 25/09/2017

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