देखा ना चलती नाव को ,,,,,,

पैरों की थिरकन सबने देखी
देखा न रिसते घाव को
लहरें देखी सागर की सबने
देखा न चलती नाव को ,,,

फलों के अपने बोझ से ही
झुक गई है उस वृक्ष की डाल
डालों का झुकना सबने देखा
देखा ना उसकी छाँव को
लहरें देखी सागर की सबने
देखा ना चलती नाव को ,,,,,,,

अपनी ही प्रखर रश्मि से देखो
चौंध गये हैं चक्षु सूर्य के
जलता सूरज सबने देखा
देखा ना उसकी राख को
लहरें देखी सागर की सबने
देखा ना चलती नाव को ,,,,,,,

उँगली पकड़ जिसे चलना सिखाया
वो बढ़ चला अपनी राह पर
चलना उसका सबने देखा
देखा ना थकते पाँव को
लहरें देखी सागर की सबने
देखा ना चलती नाव को ,,,,,,,

बचपन बीता जिसकी छाया में
बूढ़ा वो बरगद मुरझाया
मुरझाये बरगद को भूला,
मुड़कर ना देखा अपने गाँव को
लहरें देखी सागर की सबने
देखा ना चलती नाव को ,,,,,,।।

सीमा “अपराजिता “

12 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 20/09/2017
    • सीमा वर्मा सीमा वर्मा 22/09/2017
  2. Ram Gopal Sankhla Ram Gopal Sankhla 20/09/2017
    • सीमा वर्मा सीमा वर्मा 22/09/2017
  3. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 21/09/2017
    • सीमा वर्मा सीमा वर्मा 22/09/2017
  4. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar Prasad sharma 21/09/2017
    • सीमा वर्मा सीमा वर्मा 22/09/2017
  5. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 21/09/2017
    • सीमा वर्मा सीमा वर्मा 22/09/2017
  6. C.M. Sharma C.M. Sharma 22/09/2017
  7. सीमा वर्मा सीमा वर्मा 22/09/2017

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