अब परिरंभ मुकुल में रहता हूँ बंदी अलि-सा

अब तो मद पीये बिना ही आँखों के

आगे छाया रहता अंधकार, मादकता की

तरल हँसी के प्याले में, उठती लहरों को

चूमने परिरंभ मुकुल में बंदी अलि -सा

डोलता रहता दिन – रात, मन भागकर

छिप जाता नव अतीत के तुषार कण में

ढूँढकर भी न मिलता, उसका कोई अता-पता

 

अस्ताचल पर देखता हूँ, जब युवती संध्या के लाल

होंठों से बह रही मदिरा, तब कामना तरंगों से मंथित

होकर हृदय सिंधु, बड़वाग्नि उगलने लगता, मनोदेश

की वायु व्यग्र, व्याकुल चंचल हो उठती, लगता शेष

आयु के लिए निज को दीपक बना लिया, तभी तो

मेरा आत्मा देह ग्रहण करके भी, अदेह विभा-सी जीता

 

उषा की सजल गुलाबी किरणें जो धुलती थीं कभी

नीले अम्बर में,अब धुलती हुई मेघाडंबर में दीखती

वासना की मधुर छाया में, जो स्वस्थ बल कभी

विश्राम करता था,सौन्दर्यता की प्रतिमा बनकर मेरे

हृदय कुंज में रहा करता था, कब हृदय के रुद्ध

कपाट को खोलकर चला गया, कह गया मैं तो

अतिथि हूँ, मैं ज्वलित बाड़वाग्नि, मैं नित्य अशांत

मैं नित नये – नये हृदय आकारों में घुसकर उसमें

भंगिमा, तरंगित वर्तुलता भरकर परिरंभ वेदना से

विभोर कर अंगों को करती हूँ क्लांत

 

अब भी वही पवन हिलकोर उठाता आकर सागर जल में

प्रतिध्वनियाँ भी पहले की तरह ही उठतीं नभ थल में

अब भी चूमकर मृत को जिलाती, जिंदगी भरती तन में

मेरे लिए तो एक कण भी आशा का नहीं दीखता उसमें

धरा तम की छाया से निर्मित, नीला आकाश दीखता

गरल से भरा हुआ ,अमरता की शीतलता विलीन हो गई

अम्बर से, जगती तल का सारा क्रंदन भर गया नभ में

 

अब तो आँखें देखती कुछ , कानों को बताती कुछ

नजरें रहतीं कहीं, मन बहता कहीं, ठीक नहीं अब कुछ

जो बीत गया पल उसे पूर्व जन्म कहूँ, या स्पृणीय

मधुर अतीत क्या कहूँ, कर नहीं पा रहा हूँ कुछ ठीक

सुरभि समीप रहकर भी अब रहता हूँ इतना अधीर

कि रक्त सचार धमनियों में वेदना पहुँचाता , हृदय को

आती – जाती धरकनें लगतीं भार सी, अग्निकीट सा

जलता रहता हूँ मगर न आग दीखता, न उठता धुआँ ही

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