पीड़ा के पलने पर पलता … भूपेन्द्र कुमार दवे

पीड़ा के पलने पर पलता

प्यार नहीं था पछताता।

आँसू भी आँखों में आकर

नहीं सिसकने अकुलाता।

 

मुस्कानें मुस्काती दिखती

जब मिलती थीं मुस्कानों से

यादों की झुरमुट में छिपकर

मिलते थे प्रियजन अपनों से।

 

पर पलकों के पीछे आँसू

कुछ भी कह नहीं था पाता।

पीड़ा के पलने पर पलता

प्यार नहीं था पछताता।

 

जाने कितनी मीठी बातें

प्यार प्यार से बतियाता था

हँसता था, मुस्काता रहता

पर मन ही मन शर्माता था।

 

प्यारी छवि तब प्रेमभाव की

देख हृदय था हर्षाता।

पीड़ा के पलने पर पलता

प्यार नहीं था पछताता।

 

हम थे और सफर था अपना

पथ के पत्थर से अनजाना

ठोकर में भी दर्द नहीं था

काँटों फूलों से था नाता।

 

भ्रमरों का मधु गुंजन सुनकर

हर पल था बस अपना-सा।

पीड़ा के पलने पर पलता

प्यार नहीं था पछताता।

 

कब रुकती थी, क्यूँ रुकती थी

साँसें थी अल्हड़ अनजानी

आहें भरना भी न सीखा था

उर का था आलिंगन साथी।

 

मिलन हमारा सपनों-सा था

चंचल चित्त चपलता का।

पीड़ा के पलने पर पलता

प्यार नहीं था पछताता।

 

बीत गईं थी रात हजारों

सुबह किरण थी अलसायी-सी

पर जीवन की प्यारी बाती

झिलमिल जलती ही जाती थी।

 

नई रोशनी पाकर तब से

प्यार हमारा था मुस्काता।

पीड़ा के पलने पर पलता

प्यार नहीं था पछताता।

… भूपेन्द्र कुमार दवे

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5 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 09/09/2017
  2. bhupendradave 09/09/2017
  3. C.M. Sharma babucm 09/09/2017
  4. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 10/09/2017
  5. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 11/09/2017

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