क्या तब भी तुम न बोलोगे

जब सॉंस-सॉंस पर हो भारी,
हो ऑंखों पर पट्टी कारी,
जब शब्दों पर सर कटने लगे,
और बातों पर शव बिछने लगे,
क्या तब भी तुम न बोलोगे
और सत्य से ऑंखें मींचोगे…

जब ‘कल्पना’ को ‘घटना’ और
‘स्वार्थ’ को ‘सच’ बनाकर परोसा जाएगा,
हम यूँ ही बँटते-कटते जाएँगे,
दाभोलकर, पानसारे सियासत की बली चढ़ते जाएँगे..
जब हर निर्भीक सच बोलने वाले की
आवाज़ दबाई जाएगी,
और मौत पर हँसने वालों को,
सत्ता की शय दी जाएगी,
क्या तब भी तुम न बोलोगे
और सत्य से ऑंखें मींचोगे…

तुम यूँ ही ‘दैनिक व्यस्तता’ के पर्दे के पीछे छिपकर चुपचाप तमाशा देखते रहना,
और हर गौरी, कालबुर्गी की हत्या पर,
ट्विटर और फेसबुक पर ‘दुख’ व्यक्त करते रहना,
जब तुम ख़ुद पीड़ित होके छटपटाओगे
और धंसते जाओगे इस राजनैतिक दलदल में,
क्या तब भी तुम न बोलोगे
और सत्य से ऑंखें मींचोगे…

11 Comments

    • Garima Mishra Garima Mishra 09/09/2017
  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 08/09/2017
    • Garima Mishra Garima Mishra 09/09/2017
  2. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar Prasad sharma 08/09/2017
    • Garima Mishra Garima Mishra 09/09/2017
  3. Madhu tiwari Madhu tiwari 08/09/2017
    • Garima Mishra Garima Mishra 09/09/2017
  4. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 08/09/2017
    • Garima Mishra Garima Mishra 09/09/2017
  5. C.M. Sharma babucm 09/09/2017

Leave a Reply