धूप की चिरैया

उड़ती है पार-द्वार धूप की चिरैया । 

पानी के दर्पण में, बिम्ब नया उभरा, 

बिखर गया दूर-पास, एक-एक कतरा । 

पलकों-सी मार गई धूप की चिरैया । 

पूरब में कुंकुम का, थाल सजा-सँवरा, 

किरणों-सी दुलहन का, रूप और निखरा । 

आँगना गई बुहार धूप की चिरैया । 

यहाँ-वहाँ, इधर-उधर, फुदक-फुदक नाचे, 

सुख-दुख की आँखों के, शब्दों को बाँचे । 

रोज़ पढ़े समाचार धूप की चिरैया ।

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