चिड़िया

शाम बढ़ती जा रही थी
बेचैनी
उमड़ती जा रही थी
शाख पर बैठी अकेली
दूर नजरों को फिराती
कुछ नजर आता नहीँ
फिर भी फिराती
चीं चीं करती
मीत को अपने बुलाती
पंख अपने फड़फड़ाती
बाट में वो प्रीत की
फिर सोचती
कि आज कैसे देर कर दी
आने उनको दो भला
फिर देखती हूँ
मै बताती हूँ उन्हें तो
फिर क्षितिज से
एक चंचल सी आवाज़ आती
चिड़िया उसके सुर में अपना
सुर मिलाती
चीं चीं गाती
-रणदीप चौधरी ‘भरतपुरिया’

12 Comments

  1. chandramohan kisku chandramohan kisku 01/10/2017
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 01/10/2017
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 01/10/2017
  4. Madhu tiwari Madhu tiwari 02/10/2017
  5. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 03/10/2017

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