ब्रज की होली कान्हा संग हो ली – मनुराज वार्ष्णेय

ब्रज की गलियों का देखो ये नजारा
रंग लगाने राधा को आया कृष्ण प्यारा
देखो राधा को सखियों संग खड़ी है
रंग लगाने की मस्ती इसको चढ़ी है

देख राधा प्यारी तेरा कान्हा है आया
साथ मे तो देखो ग्वालों को भी है लाया
तिरछी नजर उसकी ढूंढे है किसको
देख रंग लगाने आया है राधा तुझको

देख कर के कान्हा को राधा चहक गयी
आज तो ब्रज की हर एक गली महक गयी
देखो राधा को तो कैसे इतरा रही है
काहे कान्हा को तू इतंजार करा रही है

तब अचानक कान्हा राधा को देखते
एकटक वो देखे पलक तक न झपकते
मंद मंद गति से दोनों पास आये
कान्हा अपनी राधा को देख के मुस्काये

कान्हा तुम क्यों मेरी गली में हो आये
देखो सखियों इसको बचके न जाने पाए
जान पर खेल के तुम यहाँ हो आये
कोई भी गोपी न तुमसे रंग लगवाए

ओ मेरी राधा तू है बहुत ही भोली
जाऊँगा मैं न खेले बिना तुझसे होली
आज तो जी भर के रंग लगाऊँगा
तेरे गोरे रंग पे मैं श्याम रंग चढ़ाऊँगा

देखो अपना कान्हा राधा के पीछे भागे
गोपियाँ संग ग्वाले भी देख हाँसन लागे
हाथ भरे है दोनों के रंग गुलाल से
राधा लगवाए रंग अपने नंदलाल से

ओ मेरे कान्हा तू सुन ले बात मेरी
दिल मेरा भी मचला है देख प्रीत तेरी
ओ मेरे कान्हा तू एक एहसान कर दे
दिल मेरा है खाली खाली जगह को भर दे

 

कवि – मनुराज वार्ष्णेय 

3 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 02/09/2017
  2. Madhu tiwari Madhu tiwari 02/09/2017
  3. C.M. Sharma babucm 04/09/2017

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