एक परिंदा

एक परिंदा

उड़ता जाए एक परिंदा
मन तो है बस बावरा सा
वह तो बस उड़ना जाने
कौन जाने उनका सहारा है कहां तक
उनका इशारा है कहां तक

डाल -डाल पर बैठे
मन को तो बहलाता जाए
कली मिले तो थिरक सा जाए
कौन जाने उनका थिरकना है कहां तक
उनका इशारा है कहां तक

बारिश के फव्वारों में
झूमता वो झूमता ही जाए
कभी ऊपर कभी नीचे
फुदकता वो फुदकता ही जाए

छूना चाहे आसमान को
बादल से डर सा जाए
बिजलियों की एक कड़क से
मन भी उनका ठहर सा जाए
कौन जाने ठहरे हुए मन की सहारा है कहां तक
उनका इशारा है कहां तक

उड़ता जाए एक परिंदा
मन तो है बस बावरा सा
वह तो बस उड़ना जाने
कौन जाने उनका सहारा है कहां तक
उनका इशारा है कहां तक

—-मु.जुबेर हुसैन

8 Comments

  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 01/09/2017
    • md. juber husain md juber 03/09/2017
    • md. juber husain md juber 03/09/2017
  2. C.M. Sharma babucm 02/09/2017
    • md. juber husain md juber 03/09/2017
  3. Madhu tiwari Madhu tiwari 02/09/2017
    • md. juber husain md juber 03/09/2017

Leave a Reply