मैं खुद के मुकाबिल हुआ

मैं खुद के मुकाबिल हुआ।
कुछ इस तरह नाकाबिल हुआ।।

फना हुआ खुद को बचाने के लिये।
मगर आखिर खाक तक न हासिल हुआ।।

मरता रहा खुदी में हर रोज।
क्याें मैं खुद का कातिल हुआ।।

बताया था किस्सा अपनी बरबादी का बस कुछ अजीजों को।
अखिर क्याें ये तमाशा-ए-महफिल हुआ।।

यूँ तो पढ़े थे उसने भी दर्जे दो चार।
फिर क्यों इश्क में जाहिल हुआ।।

जलाये थे चराग जिन माँ-बाप ने उम्रभर।
उन्हें बुढ़ापे में अंधेरा क्याें हासिल हुआ।।

वो साथ यूँ तो हमेशा रहा।
मगर क्यों न मुझमें वो शामिल हुआ।।

फंसा रहा वो तूफां में।
मयस्सर उसे न साहिल हुआ।।
अविनाश कुमार

6 Comments

  1. md. juber husain md. juber husain 01/09/2017
  2. C.M. Sharma babucm 01/09/2017
  3. Madhu tiwari Madhu tiwari 01/09/2017
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 01/09/2017
  5. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 01/09/2017

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