तुम्हारे पास देह था

शब्द जब थोथे लगने लगे
तुमने देह इस्तमाल किया,
गुरेज नहीं किया,
शब्द उथले हो गए,
देह वाचाल हो गए।
देह को खुलने दिया,
जहां तक जा सकती थी गंध,
रूप,भाव, गठन,
तुमने शब्दों पर रख दिए देह।
शब्द हल्के हो गए,
देह भारी खुलने लगे,
तुम्हारे लिए शब्द से ज्यादा,
वाचाल थे देह।
देह की भाषा मालूम था तुम्हें
तुमने परहेज नहीं किया,
कलम को देह पर चलने दिया,
निरपेक्ष हो देह को जीया।
कलमकार तुम्हारे समय के पीछे होते गए
तुम बैनरों पर,
बाजार में छाती चली गई,
कौन था तुम्हारे साथ दौड़ में?
तुमने देह को कविता की तरह बुना,
उपन्यास की तरह एक एक किनारे खोले।
देह कविता से आगे,
उपन्यास के पात्रों की तरह
पढ़ने लगे तुम्हारे देह के कोनों,
रंग रूप की तारूफ भी होने लगी।
कलम पिछड़ती रही,
भाषा जो थी तुम्हारे देह की,
वाचाल हो घूरती रही,
बाजार की नजर थी,
तुम्हें चुनने को बेताब।

6 Comments

  1. लालित्य ललित 30/08/2017
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 31/08/2017
  3. C.M. Sharma babucm 31/08/2017
  4. नवल पाल प्रभाकर naval pal parbhakar 31/08/2017
  5. kprapanna 31/08/2017

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