तुम्हारी मन की बात पर

तुम्हारी मन की बात पर

प्रश्न सारे उठाकर रख दो ताक पर,
जिसे जबाब देना है
उसकी औकात नहीं जबाब देने की,
पथ केवल एक ही शेष
ठान लो मन में
बाँध लो मुठ्ठियाँ
निकल पड़ो,
ख़ाक में उसे मिलाने
जो चुप रहता है हर बवाल पर
उसकी कोई औकात नहीं
प्रश्न उठाने की
हमारे इस जबाब पर,

अच्छी नहीं हिंसा
आस्था के सवाल पर,
सुनते सुनते कान पाक गये
बहरे से कौन पूछेगा यह सवाल
फिर क्यों चुप रहते हो हर बवाल पर?
क्या पहचानते नहीं तुम
उन मवालियों को
जो फैलाते हैं हिंसा है सवाल पर?

न्यायालय फैसले करते हैं
सजा देते हैं या बरी कर देते हैं
यह सवाल
कभी सत्ता तंत्र से मुक्त न रहा
पर, मिटता नहीं वह दाग
जो लग जाता है माथे पर
एक बार तिलक बनकर
स्वयं को निहारो कभी खड़े होकर
दर्पण के सामने
तुम्हें दिख जायेंगे
हजारों मासूम चेहरे तुम्हारे पीछे
करते ढेरो सवाल
तुम्हारी मन की बात पर,

अरुण कान्त शुक्ला
28/08/2017

5 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 28/08/2017
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 28/08/2017
  3. Madhu tiwari Madhu tiwari 28/08/2017
  4. C.M. Sharma babucm 29/08/2017

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