रानी लक्ष्मीबाई (आल्हा छन्द)

आल्हा (वीर छन्द)

अस्सी घाट बनारस जन्मी, मणिकर्णिका रखा ये नाम
अमर हुई इतिहास बनाकर,सारे जग को दी पैगाम
माँ की मृत्यु हुई बचपन में, पिता के साथ गयी बिठूर
अस्त्र शस्त्र की सारी विद्या,सीख मनु हो गयी मशहूर

बाजीराव पेशवा मनु का,प्यार से ले छबीली नाम
पिता संग में भोली भाली,सदा सीखती अद्भुत काम
सात साल की लक्ष्मीबाई,घोड़े पर हो गयी सवार
तीर धनुष पारंगत होके,कौशल से सीखी तलवार

काशी की मनु झाँसी रानी,पल में बनी आग तूफान
हिम्मतवाली बन मतवाली,बड़ो बड़ो की बन्द जुबान
टेढ़ी नजर पड़ी गोरों की,रानी समझ गयी हर बात
फौरन दलबल सैन्य सजाकर, रक्षा करती है दिनरात

आठ दिनों तक गोला बरसे,रणचण्डी बन गयी जुझार
घेरा बन्दी हुई किले की,करके गोली की बौछार
दूल्हा सिंह बना है भेदी,खोल दिया दक्षिण का द्वार
भीतर घुसकर ये फिरंगी,बहुत किये धोखे की मार

बिजली कड़क भवानी शंकर,घन गर्जन गोला तैयार
खुदाबक्श औ गौसा खां ये,माहिर तोप चलाते यार
तड़ तड़ गोली गोला गरजे,होने लगा वार पे वार
हो उमंग में झाँसी रानी,होकर घोड़े पर असवार

दौड़ा दौड़ाकर दुश्मन को,लगी काटने ले तलवार
कांप उठी ये गोरी सेना, देख उग्र रानी अवतार
बांध पीठ पर अबोध बालक,चंडी रूप बनी तत्काल
अंग्रेज़ो की शामत आयी,चमक उठी रानी करवाल

रामा राव देशमुख शानी,अंत समय तक रानी साथ
देख वीरता डरते गोरे, जनता लगी झुकाने माथ
लहू धार बहती है रण में,रानी नही हुई कमजोर
भाग रही अंग्रेजी सेना,कांप उठे धरती नभ छोर

बढ़ी कालपी में जब रानी,करते घाती पीछे वार
गोली लगी पाँव में जाकर, रानी तनिक न मानी हार
पीछे दुश्मन हमला बोले, सिर पर घात किये बदकार
फटी खोपड़ी फिर भी रानी,मारी पीछे घूम कटार

थर थर थर थर वैरी काँपे,देख रूप रानी अंगार
मर्दानी झाँसी की रानी,मरते दम तक करती वार
गिरी भूमि पर लक्ष्मी बाई,कुटिया में ले जाते वीर
बाबा गंगा दास प्रेम से,रानी के मुँह डाले नीर

आन मान पर मिटकर रानी,पायी सदा स्नेह सत्कार
चढ़कर गयी स्वर्ग सिंहासन, धरती गगन करे जयकार
धन्य हुई भारत की बेटी,पाकर ममता और दुलार
जबतक सूरज चाँद रहेगा, यश गाथा गाये संसार

डॉ. छोटेलाल सिंह (प्रवक्ता)

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