लफ्ज़ मेरे — डी के निवातिया

लफ्ज़ मेरे

***

लफ्ज़ मेरे एक रोज़ ज़माना बोल रहा होगा
रफ्ता रफ्ता सबके वो राज़ खोल रहा होगा !!

ज्यों ज्यों पढ़े जायेंगे पन्ने उलझी डायरी के
ना जाने कितनो का मन  डोल रहा होगा !!

कोई बैठा होगा उदास तन्हाई में मेरे बगैर
कोई कर्मो को नेकी बदी में तोल रहा होगा !!

कलयुग में वो भी करेगा प्रवचन बड़े मंचो से
जिसका न कोई इतिहास,न भूगोल रहा होगा

याद करेगा “धर्म” तुझको हर कोई यहां पर
अगर ज़माने में तेरा कोई मोल रहा होगा !!

!
!
!
डी के निवातिया

*** *** ***

22 Comments

  1. Abhishek Rajhans 23/08/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 11/09/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 11/09/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 11/09/2017
      • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 11/09/2017
  2. Madhu tiwari Madhu tiwari 23/08/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 11/09/2017
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 23/08/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 11/09/2017
  4. C.M. Sharma babucm 24/08/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 11/09/2017
  5. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 24/08/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 11/09/2017
  6. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar Prasad sharma 24/08/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 11/09/2017
  7. Meena Bhardwaj Meena Bhardwaj 25/08/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 11/09/2017
  8. Rajeev Gupta Rajeev Gupta 26/08/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 11/09/2017
  9. ALKA ALKA 26/08/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 11/09/2017

Leave a Reply