तब अकेला था मैं जिंदगी में , अब अकेले में रहने लगा – मनुराज वार्ष्णेय

जिसको मैंने सोचा कभी न , काम वो भी मैं करने लगा
तब अकेला था मैं जिंदगी में , अब अकेले में रहने लगा

जब से तू आयी है जिंदगी में , जाने क्या क्या तब से हुआ
डर लगता था जो मौत से , अब तो हर रोज मरने लगा

खोने पाने का न डर था पहले , अब कैसे बदल मैं गया
जब से तुझको मैंने है पाया , तुझको खोने से डरने लगा

स्कूली किताबों में था उलझा , कुछ और समझ मे न आता
प्रेम का सुर जो तूने है छेड़ा , प्रेम के गीत मैं गाने लगा

मंदिरों में जो जाता था पहले , मांगता था न कुछ उस खुदा से
एक इबादत मेरी बनी , फिर तुझी को मैं मांगने लगा

नशीले शराबी वो नैना , देखकर हाल कुछ ऐसा हुआ
झूमे दिल बेधड़क फिर मेरा तो , प्यार का रंग चढ़ने लगा

अब तो कुछ ऐसा हाल है मेरा , ख्वाब के संग पलने लगा
तेरी याद में ही रात बीती , सूना सा दिन भी ढलने लगा

 

कवि – मनुराज वार्ष्णेय

14 Comments

  1. angel yadav anjali yadav 20/08/2017
  2. Madhu tiwari Madhu tiwari 20/08/2017
  3. Swati naithani Swati 20/08/2017
  4. C.M. Sharma babucm 21/08/2017
  5. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 21/08/2017
  6. Kajalsoni 22/08/2017

Leave a Reply