हवा कहीं से उठी, बही / अज्ञेय

हवा कहीं से उठी, बही-
ऊपर ही ऊपर चली गई ।
पथ सोया ही रहा :
किनारे के क्षुप चौंके नहीं
न काँपी डाल, न पत्ती कोई दरकी
अंग लगी लघु ओस-बूँद भी एक न ढरकी ।

वन-खण्डी में सधे खड़े पर
अपनी ऊँचाई में खोए-से
चीड़
जाग कर सिहर उठे
सनसना गए ।
एकस्वर नाम वही अनजाना
साथ हवा के
गा गए ।

(2)

ऊपर ही ऊपर
जो हवा ने गाया,
देवदारु ने दोहराया,
जो हिम-चोटियों पर झलका,
जो साँझ के आकाश से छलका-
वह किस ने पाया
जिस ने आयत्त करने की आकाँक्षा का हाथ बढ़ाया ?

आह ! वह तो मेरे
दे दिए गए हृदय में उतरा,
मेरे स्वीकारी आँसू में ढलका :
वह अनजाना अनपहचाना ही आया ।
वह इन सब के- और मेरे- माध्यम से
अपने को अपने में लाया,
अपने में समाया ।

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