पहाड़ तुम बिल्कुल नहीं बदले,


वही रंग रूप
वही शिखर,
शिखर पर पेड़,
चरणों में नदी।
तुम्हारी लटों से खेलती
झाड़ियां
शैवाल, चीड़,
भूरे भूरे काई लगे पेड़,
सड़कें बलखाती
किस मोड़ पर मुड़ जातीं।
तुम नहीं बदले पहाड़
बस भूगोल बदल जाता,
तुम्हारी प्रकृति वही रहती,
कितने शांत मौन खडे हो
सदियों सदियों तलक।
करवटें लेते हो तो
आ जाता
भूचाल,
शहर गांव,
समा जाते तुम्हीं में
ठीक ही कहा था
कृष्ण ने हमी में शामिल
हमीं से निकली दुनियां।
तुम्हारे ही कोड में
गांव,शहर बसते,
जनमते
और तुम्हीं में समा जाते
शहर दर शहर।
पहाड़ तुम नहीं बदले
बदल गए हम,
फोड़ डाला तुम्हारा माथा,
खोद डाली छाती तुम्हारी।
सुबह से शाम हुई
कई रंग बदले तुमने,
तुम्हीं में उतर कर बादल बरसते,
तुम्हीं से निकलती
नदी
बलखाती
उतर जाती नगर नगर।
तुम तब भी खामोश खड़े रहे।

3 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 17/08/2017
  2. Madhu tiwari madhu tiwari 17/08/2017
    • kprapanna 17/08/2017

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