कैसा खेल रचाया

बोलें मुझसे सखियों मोरी
तू है बड़ा चितचोर
हर रंग तेरा है निराला
करे मन को अति विभोर
दिखाता सपने कैसे कैसे
नाचे मन जैसे कोई मोर

दर पे तेरे जो आ गया
तू मन में उसके समा गया
है जादूगरी कैसी ये कान्हा
हर रंग तेरा उसे भा गया
प्रीत तेरी बड़ी निराली
धन्य हुआ जो चरणों में आया
चरण रज जो पाई तेरी
न मोह माया से फिर भरमाया
बताने को जग की रीत
तरह २ से हमें उलझाया
बुला फिर शरण में अपनी
सारी उलझनों को सुलझाया
तेरी माया तू ही जाने
कैसा कैसा खेल रचाया
लीलाएँ तेरी कोई कैसे जाने
कैसा कैसा भेष बनाया
गोपियों के संग रास रचाया
हर गोपी का मन भरमाया
चितवन तेरी एैसी निराली
मन में सबके तू है समाया
है तू चितचोर जाने जग सारा
पर किसी ने तेरा भेद न पाया

10 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 16/08/2017
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 17/08/2017
  2. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 16/08/2017
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 17/08/2017
  3. Kajalsoni 16/08/2017
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 17/08/2017
  4. Meena Bhardwaj Meena Bhardwaj 17/08/2017
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 17/08/2017
  5. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 17/08/2017
    • kiran kapur gulati kiran kapur gulati 17/08/2017

Leave a Reply