क्षितिज की रेखा

इस जगह से जो क्षितिज दिखता है,
वह सीधी रेखा वाला क्षितिज नहीं है,
उस क्षितिज की रेखा ऊंची-नीची हो गई है।
एक चौरस शीषर् वाले पहाड ने,
बीच में आकर,
क्षितिज की सीधी रेखा को टेढ़ी-मेढ़ी कर दिया है।
गांव के लोग उस पहाड को श्रवण डोंगरी कहते हैं।
कहते हैं, उसी पहाड पर मारा गया था श्रवण कुमार,
माता पिता के प्यार में,
आैर फिर अकेले रह गए थे, उसके अंधे माता-पिता,
अपने एकमात्र आैर लाड़ले पुत्र के बिना,
निःसहाय आैर बेचारगी के साथ ़ ़ ़।
एक दुःख, आैर भेदने वाली पीड़ा का प्रतीक है वह पहाड़,
तभी उसने अपनी उपिस्थति दजर् की है,
क्षितिज की सीधी रेखा को बिगाड़कर,
तभी वह जम गया है,
उस रेखा को ऊंचा-नीचा करके।
चौरस आैर सपाट शीषर् के साथ,
वह पहाड़,
पहाड़ ना लगकर किसी विशाल टीले सा लगता है,
ठीक उसी तरह,
जब हम रो नहीं पाते हैं,
आैर खोने लगते हैं अपना शीषर्,
पता भी नहीं चलता,
कब घिसकर चौरस हो जाता है,
आकाश की आेर उम्मीदों आैर उमंगों के साथ उठा हुआ हमारा थूथन ़ ़ ़।
उस पहाड़ ने ढंक लिया है,
आकाश का थोड़ा सा हिस्सा,
जो उसके पीछे दबा हुआ है,
जो दिखता,
अगर होता सीधी लाइन वाला क्षितिज।
ऐसा लगता है,
उस पहाड़ ने जानबूझकर नहीं किया है यह सब,
जैसे हम छिपाते हैं,
कुछ बातें आैर कुछ पीड़ा के सपाट से प्रतीक,
आैर यों खुल जाता है,
हमारा दुःख।
कोई योजना नहीं थी,
क्षितिज की उस सीधी रेखा को ऊंचा-नीचा करने की,
वह बस हो गया है,
श्रवण डोंगरी के टीलेनुमा दुःख से।

क्षितिज की सीधी रेखा,
वास्तव में एक जोड़ है,
एक सिलाई,
या बबर्रतापूवर्क चिपका दिए गए दो टुकडे़,
धरती आैर आकाश के टुकड़े।
जैसे घर की देहरी होती है,
घर का भीतर आैर बाहर के संसार का जोड़।
पर एक अंतर है,
हम देहरी को पार कर बाहर के संसार में होते हैं,
पर अब तक क्षितिज की कोई ऐसी पार नहीं मिली,
कि ज़मीन से एक पैर आगे बढाकर मैं आकाश में पहुंच जाऊं।
लंबी-लंबी यात्राआें के बाद भी,
मैं आज तक उस रेखा पर नहीं पहुंच पाया हूं,
जो रोज़ दिखती है,
आैर जिसे देखकर यकीन होता है,
कि बस एक कदम की बात है यह पूरा आकाश।
मेरे पास अब तक,
आकाश में पहंुचने का वही घिसा पिटा तरीका है – उड़ान।
कुछ लोगों ने बताया है,
कि ऐसी यात्रा है,
जिसकी रोड़ धरती आैर आकाश के बीच की उस रेखा तक जाती है,
मैं अब तक उस यात्रा को चुन नहीं पाया हूं,
ताकि हो,
उड़ान से बेहतर एक आैर तरीका पहुंचने आकाश में ़ ़ ़।

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