मैं आज बहुत डर रहा हूँ – मनुराज वार्ष्णेय

मैं आज बहुत डर रहा हूँ 
यादों को दोहरा रहा हूँ दिल को समझा रहा हूँ
क्या है मेरे डर का राज ये आपको बता रहा हूँ 
मैं आज बहुत डर रहा हूँ

समझ नही मैं उसको पाया उसकी हरकतें डरा रही है 
मेरे दिल को रुला रही है मेरी तड़पन बड़ा रही है
सहज बैठा हूँ अपने दिल को आँखों को भिगो रहा हूँ
मैं आज बहुत डर रहा हूँ

दूरी का एहसास हो रहा मेरा अब आपा भी खो रहा
मोटी हो गयी है ये आँखें पलकों पर चिंता का बोझ ढो रहा
सर्द पवन की हुज्जत्तों से दिन रात विकट कराह रहा हूँ
मैं आज बहुत डर रहा हूँ


कवि - मनुराज वार्ष्णेय

6 Comments

  1. Madhu tiwari Madhu tiwari 12/08/2017
  2. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar Prasad sharma 12/08/2017
  3. C.M. Sharma babucm 12/08/2017

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