“त्रिवेणी”

(1)

सारी दोपहर यूं ही खर्च कर दी‎
कुछ लिखकर काटते हुए ।

सोचों में डूबा मन बिलकुल खाली था ।

(2)

गाँव दिन भर चादर तान के सोया था
सांझ ढले घरों में उठते धुएँ से सुगबुगाहट हुई है ।

भोर होते ही वह फिर सो जाएगा।

××××××

कोशिश की है कुछ नया करने की . कभी पढ़ी थी गुलजार साहब की लिखी‎ त्रिवेणी ….,लगा बात कहने का हुनर शायद ही जुट पाए लेकिन शर्मा‎ जी की लिखी‎ त्रिवेणी और उनकी व्याख्या पढ़ कर लगा कोशिश कर के देखूं . सुझाव सादर आमन्त्रित हैं .

“मीना भारद्वाज”

13 Comments

  1. Madhu tiwari Madhu tiwari 11/08/2017
    • Meena Bhardwaj Meena Bhardwaj 13/08/2017
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 11/08/2017
    • Meena Bhardwaj Meena Bhardwaj 13/08/2017
  3. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 12/08/2017
    • Meena Bhardwaj Meena Bhardwaj 13/08/2017
    • Meena Bhardwaj Meena Bhardwaj 13/08/2017
  4. Kajalsoni 12/08/2017
    • Meena Bhardwaj Meena Bhardwaj 13/08/2017
  5. C.M. Sharma babucm 12/08/2017
  6. Meena Bhardwaj Meena Bhardwaj 13/08/2017
  7. ALKA ALKA 26/08/2017

Leave a Reply