दूसरी निर्भया

शीर्षक–“दूसरी निर्भया”
ये सच है
मेरी कोई सगी बहन नहीं
सालो से सुनी है मेरी कलाई
हर राखी मेरी आँखों में
होते हैं आंसू
पर नहीं होती कहने वाली भाई
मैं सोचता हूँ
रिश्ते धागे के मोहताज़ नहीं होते
वो तो दिल से होते हैं
क्या हुआ जो
मेरी सगी बहन नहीं
पर कुछ बहने और भी तो हैं
डरी सहमी सी सडको पे जाते हुए
जिसे अँधेरे से डर नहीं लगता
उन्हें डर लगता है
बस अपने होने से
खुद के वजूद को बचाने से
क्यों डरेगी वो
अकेले कॉलेज जाने से
गोलगप्पे खाने से
क्यों डरेगी वो
मुश्कुराने से
वो तो फूल है
हमारे बगीचे का
तो क्यों रोके हम उन्हें
खिलने-खिलखिलाने से
मैंने तो सोच लिया
क्या हुआ जो
मेरी अपनी बहन नहीं
ये भी तो कुछ कम नहीं
मैं दूंगा इन्हें पंख उड़ने को
मैं दूंगा अपनी कलाई
राखी सजाने को
मैंने तो सोच लिया
चलूँगा उसका साया बनकर
धुप में उसकी छतरी बनकर
वो जिए अपनी ज़िन्दगी
उसकी निगाहेबान है
उसकी भाई की आँखे
मैंने तो सोच लिया
आप भी विचार कीजिये
बढाइये कलाई
ताकि ना छुटे किसी बहन की रुलाई
ताकि ना बन सके कोई और
दूसरी निर्भया——-अभिषेक राजहंस

11 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 07/08/2017
  2. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar Prasad sharma 07/08/2017
  3. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 07/08/2017
    • Abhishek Rajhans 10/08/2017
    • Abhishek Rajhans 10/08/2017
  4. Madhu tiwari Madhu tiwari 08/08/2017
    • Abhishek Rajhans 10/08/2017
  5. Kajalsoni 09/08/2017
    • Abhishek Rajhans 10/08/2017