रात में जागा / अज्ञेय

रात में जागा
अंधकार की सिरकी के पीछे से
मुझे लगा, मैं सहसा
सुन पाया सन्नाटे की कनबतियाँ
धीमी, रहस, सुरीली,
परम गीतिमय ।

और गीत वह मुझ से बोला, दुर्निवार,
अरे, तुम अभी तक नहीं जागे,
और यह मुक्त स्रोत-सा सभी ओर वह चला उजाला !
अरे, अभागे-
कितनी बार भरा, अनदेखे,
छलक-छलक बह गया तुम्हारा प्याला !

मैंने उठ कर खोल दिया वातायन-
और दुबारा चौंका :
वह सन्नाटा नहीं-
झरोखे से बाहर
ईश्वर गाता था ।
इसी बीच फिर
बाढ़ उषा की आई ।

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