कुण्डलिया

*कुण्डलिया*

भोजन हो नित खीर का, ऐसी है तकदीर
जिस घर मे दाने नहीं, कौन समझता पीर
कौन समझता पीर, नीर नैनो से बहता
ठोकर खाता घोर, निबल दुख कैसे सहता
पेट पीठ सब एक, टूटती उसकी धड़कन
काजू खा इतराय, किसी को मिले न भोजन ।1।

हालत ऐसी हो गयी, जीना ये दुस्वार
माँगे भीख नही मिले,मिले नही आधार
मिले नही आधार, सदा ही पड़ते लाले
रूठी किस्मत आज, बया करते ये छाले
बन धनवान महान, सदा ही करे जलालत
भारी भेद कुभेद, बिगड़ती जाती हालत।2।

अपना धर्म निभा गए,करके अद्भुत काम
अपने पौरुष से किये,देश धरा का नाम
देश धरा का नाम, गए कर ऊँचा शानी
भारत के जाबाज, जिगर जिनका बलिदानी
लिए हाथ पर जान, किये सच माँ का सपना
होकर खुद कुर्बान, बचा गए देश अपना।3।

*डॉ छोटेलाल सिंह (प्रवक्ता)*

8 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 02/08/2017
  2. Madhu tiwari madhu tiwari 02/08/2017
  3. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 03/08/2017
  4. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar Prasad sharma 03/08/2017
  5. babucm babucm 03/08/2017
  6. Dr Chhote Lal Singh Dr Chhote Lal Singh 03/08/2017
  7. Vikram jajbaati Vikram jajbaati 04/08/2017

Leave a Reply