संसार की अचिरता

संसार की अचिरता

पिता की अंगुलियां
नादान शिशु के डगमग पाँव
अबोध मन की आशा
शनैः शनैः जीवन पथ पर अग्रसर
नव चिराग की हसरत
उमंग तरंग में रोशनी बिखेरने की
मिला अवलम्ब बढ़ा मन आगे
समय के भाल पर नटखट पैरो की चाल
तनमन आतुर छोड़ अवलम्ब
उन्मुक्त मन सुदूर निकल जाने की
अनवरुद्ध उद्दाम वेग बढ़ चला
मनोदेश की तलाश में अप्रतिहत
दिक्काल धरा के उस छोर पर
साहस मन अवधार्य
हो गुरु गहन आगे बढ़ा
देख संसृति का अद्भुत रूप
आकर्षित आँखे कौंध गयी
विह्वल मन जाग उठा
फिर रहा शून्य में स्वछंद
हो मुदित युवा मन निकल गया
अनुराग राग तलाश में
कमनीय कंठ से ढूंढ रहा स्पृहालाद
प्रेमालाप में अवरुद्ध
नन्हा चिराग हो गया आंधियो का शिकार
चेहरे की झुर्रियां आकुल बूढ़ी आँखे
अपलक अवलम्ब पाने को लालायित
कहाँ खो गया इन्द्रधनु की चमक दमक में
श्रान्त मन दूर तक निहारता
नीरवता के बीच संसार की
अचिरता क्षणभंगुरता याद आयी
सिहर उठा मन बार बार ll

डॉ.छोटेलाल सिंह (प्रवक्ता)

5 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 02/08/2017
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 02/08/2017
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 02/08/2017

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