हर रोज़

 हर रोज़ वही धुँआ ,
हर रोज़ वही नफरत ,
इंसानियत को खोज रही मेरे ज़मीन ,
अपनों को ही सही राह दिखाने को,
घर वापसी की बाट जोहे ,
प्रेम और सौहार्द से शांति लाने को ,
अपने लाल खो चुकी उस माँ की  हर पुकार पर ,
इस वादी ने अपनी बेबसी ही दिखाई है ,
हर रोज़ कितनी चीखे यहां दफ़न होती है ,
हर रोज़,
इंसानियत को खोज रही मेरे ज़मीन|

5 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 01/08/2017
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 01/08/2017
  3. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 01/08/2017
  4. Madhu tiwari madhu tiwari 03/08/2017

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