काव्य रो रहा है — डी के निवातिया

काव्य रो रहा है

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साहित्य में रस छंद अलंकारो का कलात्मक सौंदर्य अब खो रहा है।
काव्य गोष्ठीयो में कविताओं की जगह जुमलो का पाठ हो रहा है ।
हास्य के साथ व्यंग की परिभाषा अब इस कदर बदल गयी है ।
हंस रहे है कवी स्रोता सभी  नये सृजन के अभाव में काव्य रो रहा है ।।

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डी के निवातिया

16 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 31/07/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 09/08/2017
  2. Madhu tiwari madhu tiwari 31/07/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 09/08/2017
  3. shivdutt 31/07/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 09/08/2017
  4. raquimali raquimali 31/07/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 09/08/2017
  5. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar Prasad sharma 31/07/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 09/08/2017
  6. babucm babucm 01/08/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 09/08/2017
  7. Meena Bhardwaj Meena Bhardwaj 01/08/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 09/08/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 09/08/2017

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