सूनी सूनी साँसों के सुर में

सूनी सूनी  साँसों के सुर में

ये  आँसू कब तक  थिरकेंगे।

कभी कहीं  ये आवाज थमेगी

अब जग में ना आँसू बरसेंगे।

 

ये साँसें  हैं  दीप  सरीखी

इक जलती है, इक बुझती है

धुँआ बाती-सी जीवन ज्योति

जलती     है,  ना  बुझती है

दिव्य ज्योति जब आँखों में हो तो

आँसू   मोती  से   ही  चमकेंगे

सूनी  सूनी   साँसों  के  सुर में

ये   आँसू  कब  तक   थिरकेंगे

 

तरस रहे हैं बूँद बूँद को

पनघट पनघट  खाली है

साँसों का भंडार  भरा है

जीवन  गागर  खाली है

 

दरक उठी जब माटी की गागर

हर आँखों से  आँसू   छलकेंगे

सूनी सूनी  साँसों  के  सुर में

ये  आँसू  कब तक   थिरकेंगे

 

जीवन घट पनघट पर देखा

धूली  का   श्रृंगार  लिये

पर  यह चलती माटी देखी

फूलों  का  श्रृंगार  किये

 

टूट टूटकर यूँ साँस लड़ी से

ये आँसू  कब  तक बिखरेंगे

सूनी सूनी  साँसों के सुर में

ये  आँसू कब तक  थिरकेंगे

 

चलते  राही   चलते  रहते

धूप  छाँव  को  साथ  लिये

पर साँसों की गति में दिखती

थकती   राहें   पाँव   तले

 

यूँ साँसों का  बिखराव मिटाने

कब तक  आँसू यूँ ही बिखरेंगे

सूनी सूनी  साँसों के  सुर में

ये  आँसू कब तक   थिरकेंगे 

             … भूपेन्द्र कुमार दवे

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4 Comments

  1. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar Prasad sharma 29/07/2017
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 29/07/2017
  3. C.M. Sharma babucm 31/07/2017

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