धनि हैँगे वे तात औ मात जयो जिन देह धरी सो घरी धनि हैं

धनि हैँगे वे तात औ मात जयो जिन देह धरी सो घरी धनि हैँ ।
धनि हैँ दृग जेऊ तुम्हैँ दरसैँ परसैँ कर तेऊ बड़े धनि हैँ ।
धनि हैँ जेहि ठाकुर ग्राम बसो जँह डोली लली सो गली धनि हैँ ।
धनि हैँ धनि हैँ धनि तेरो हितू जेहि की तू धनी सो धनी धनि हैँ ॥

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