साथ — डी के निवातिया

साथ

अक्सर जब टहलता हूँ
अकेले अकेले बांधे अपने दोनों हाथ
कभी उगते सूरज को निहारने की आस में सुबह सुबह,
कभी सूनी सूनी मुझको घेरे रात
बातो ही बातो में पूछ लिया एक दिन  
मैंने अपनी ही परछाई से
क्यों चलती हो मेरे साथ
मुस्कराते हुए बड़े ही नरम लहजे में बोली
इस जमाने में कोई बाकी हो चलने वाला
मेरे सिवा तो बताना तेरे साथ।।

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डी के निवातिया

14 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 24/07/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 01/08/2017
  2. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 24/07/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 01/08/2017
  3. Anderyas Anderyas 24/07/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 01/08/2017
  4. C.M. Sharma babucm 25/07/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 01/08/2017
  5. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar Prasad sharma 26/07/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 01/08/2017
  6. raquimali raquimali 26/07/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 01/08/2017
  7. arun kumar jha arun kumar jha 26/07/2017
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 01/08/2017

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