एक प्लेटफार्म है

शहर की भीड़ भाड़ से निकल कर
सुनसान गलियों से गुजर कर
एक चमकता सा भवन
जहाँ से गुजरते है, अनगिनत शहर |

एक प्लेटफार्म है जो हमेशा ही
चलता रहता है
फिर भी
वहीं है कितने वर्षो से |

न जाने कितनो की मंजिल है ये
और कितने ही पहुंचे है
यहाँ से अपनी मंजिल
पर हर कोई बे-खबर है |

कुछ लोग दिन गुजारते है कहीं
फिर शाम को लौट कर
बिछाते है प्लेटफार्म पर एक चादर
ये बन जाता है, सराय |

रात के अँधेरे में चमचमाता
कई शहर इंतजार में
उसी इंतजार में शामिल
आज मेरा भी नाम ||

9 Comments

  1. babucm babucm 24/07/2017
  2. chandramohan kisku chandramohan kisku 24/07/2017
  3. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 24/07/2017
  4. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar Prasad sharma 26/07/2017
  5. arun kumar jha arun kumar jha 26/07/2017

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