पापा की याद – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

साये की तरह साथ देने वाले मैंनें अपने पिता को खोया था। आज फिर से याद आ गयी उनकी आँखें अपने आप ही रोया था। ठोक कुम्हार सा सुन्दर …

तू देख मेरे हुनर को देख

तू देख मेरे हुनर को देख देख ज़िन्दगी को
 मेरी नज़र से देख
 बिखरे हैं रंग कैसे२ रंगिनिओं को देख
 नहीं कमी कुछ भी कहीं
 जा के आते नज़रों …

तिनकों से ढहते हैं – शिशिर मधुकर

मुहब्बत जिनसे है मुझको वो हरदम दूर रहते हैं तन्हा तड़पाते हैं मुझको खुद भी तो पीर सहते हैं एक दिन जान ले जाएगी ये दूरी जो बैरन हैं …

गीत – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

तू मेरे मन मीत, तेरी अजब कहानी दिल लिया है जीत, तेरी अजब कहानी। तेरी सूरत चाँद से कितना मिलता है हंसती हो तो फूल के जैसा खिलता है …

ग़ज़ल – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

खुद को संहालो इतना कि बस चलना आ जाय राह जैसी भी हो, वक्त पर बदलना आ जाय। दकियानूसी से, रंगत यह बदल जायेगी रुख़ हवा का देखके, आपको …

हम ना थकते है – शिशिर मधुकर

राहों में जिन पे तुम मिले उन पे भटकते हैं मुद्दत हुई तुम्हें ढूंढते पर हम ना थकते है अमवां पे बौर आ गया पुरवाई जब चली फल मगर …

उदासी से भरा ये दिल हमारा देखिए

या तो समंदर में , वबंडर का नजारा देखिए या उदासी से भरा , ये दिल हमारा देखिए गर जिंदगी है खुशनुमा , तो कुछ ऐसा करके देखिए दिल …

प्रेम की लौ – डी. के. निवातिया

कोई कली जब फूल बनकर महक उठती है, उसे देख तबियत भंवरे कि चहक उठती है, महकने लगता है अहले चमन खुशबू से, सूने दिल मे भी प्रेम की …

अर्पण….सी.एम्.शर्मा (बब्बू)…

तू मेरा मैं तेरी फिर किसे और क्या करूँ मैं अर्पण… भाव तुम से तुम्हीं भाव हो किसका करूँ समर्पण… निर्जीव ‘मैं’ में ‘तुम’ प्राण हो किसका करूँ मैं …

Il स्मृति ll

॥ स्मृति ॥ नाम मेरा है ‘स्मृति’, मेरे जागरण से प्रकट होता है भूतकाल । मेरे ही अस्तित्व से संभव होते, भविष्य की घटनाओं के हाल ॥ 1 ॥ …

गज़ल – ए – चाँद – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

गुरु जी, मैं आपका अब मुरीद बन बैठा हूँ चाँद दिखा आज, इसलिए दीद बन बैठा हूँ। आप तो रहनुमा हैं, मेरे इन ख्यालों के चरणों में आपके एक, …

प्रीत के फेरे – शिशिर मधुकर

तुम्हें दिल दे दिया मैंने नहीं कुछ पास अब मेरे मेरी साँसों की खुशबू बस चुकी है साँसों में तेरे दूरियां अब कभी हमको परेशां कर न पाएंगी हवाएं …

कडुवे अहसास की मीठी शा’इरी—(संकलनकर्ता: महावीर उत्तरांचली)

(1) इस वक़्त हम से पूछ न ग़म रोज़गार के हम से हर एक घूँट को कड़वा किया न जाए —जाँ निसार अख़्तर (2) मरीज़-ए-ख़्वाब को तो अब शिफ़ा …