स्वयं को सौंप कर स्वयं से हारी हूँ,मैं एक नारी हूँ।

स्वयं को सौंप कर,मैं स्वयं से हारी हूँ, मैं एक नारी हूँ। कर्तव्यों को रखा सर्वोपरि, अधिकारों को न् मोल दिया, अपनो की खातिर,अपने ख्वाबों को, पल भर में …

नजरें – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

कवि – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु) काश ये नजरें बदल जाती, प्यार में झूठ का पर्दा उठता, बीच बाजार में। भरोसा खुद पर, अगर नहीं हो आपका तो फिर, …

सादगी

उड़ते बाल जब चेहरे पर आ जाते है लहराती हैं हवाऐ पर्वत गीत गाते हैं | पलकें आपकी तो हया बहुत लुटाती हैं काले बादलों में जैसे मेघ घनघनाते …

इतना साथ निभा देना

यदि तुम मुझको जान सके हो इतना साथ निभा देना मेरे होने का आशय दुनिया को समझा देना मैं सक्षम पर वक़्त नही था जो सम्मुख वह सत्य नही …

अगर कभी मेरी याद आए…….

अगर कभी मेरी याद आए तो खिड़की से पर्दा हटाकर उस अधूरे चाँद को देख लेना, वो सिसकता हुआ तुम्हारे कदमो में उतरेगा, फिर मैं मिलूँगा तुम्हे उस चाँद …

माहताब – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

बागों के इस चमन में, माहताब हो तुम फूलों सा महकता, कोई गुलाब हो तुम। नुरानी ये गाल पर, गुलमोहर सी चमक नजरें इनायत, जैसे कि शराब हो तुम। …

ज़लवा दिखाओ तो जाने – डी के निवातिया

ज़लवा दिखाओ तो जाने *** आज भी पहले सा मुस्कराओ तो जाने फिर से वही ज़लवा दिखाओ तो जाने !! मुहब्बत को तरस गयी है प्यासी निगाहें फिर उसी …

मंजिलें मुकाम पाती रही हूँ।।

नज़्म।। उम्मीद के दीये जलाती रही हूँ, तूफाँ में भी कश्ती चलाती रही हूँ।। हौसले डगमगा नहीं सकते हैं मेरे, विश्वास को मन में बढ़ाती रही हूँ।। नहीं तोड़ …

जमाने ने यह कैसी करवट ली – अनु महेश्वरि

जमाने ने यह कैसी करवट ली है, शोर के बीच एक खामोशी सी है। यह कैसे वक़्त का आगाज हुआ, हर कोई यहाँ देखो नाख़ुश ही है। बैचेनी का …

जाने ये किसका दोष है – शिशिर मधुकर

ढूंढ़ते हैं हम जहाँ पे ज़िन्दगी मिलती नहीं जाने ये किसका दोष है कलियां अब खिलती नहीं पत्तियां इस पेड़ की खामोश हैं मायूस हैं जब हवा ही ना …

जब भी तुम्हारे पास आता हूँ मैं

जब भी तुम्हारे पास आता हूँ मैं कितना कुछ बदल जाता है सारी दुनिया एक बंद कमरे में सिमिट जाता है सारी संसार कितना छोटा हो जाता है मैं …

दोहे – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

धरा धधकती तपन से, है सूरज अंगार। त्राहि – त्राहि अब मच रही, बिन पानी संसार। ताल पोखर सूख गये, विलख गये सब जान हरितिमा सब झुलस रहे, गर्मी …

दोहे – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

घटता – बढ़ता चाँद है, बहुत अजब है खेल साथ सूर्य अरु चाँद का, होता कभी न मेल। नदियाँ कल – कल वह रही, झरने गाते गीत घूंघट ओढ़े …

चश्मे का नंबर बढ़ा

चश्मे का नंबर बढ़ा !! ———————————- बिन चश्मे का बचपन था हर कोई दोस्त हर कहीं अपनापन था। ज्यों-ज्यों चश्मे का नंबर बढ़ा । त्यों-त्यों सच्चाई से पर्दा हटा …

अपना – पराया – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

कवि – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु) यहाँ अपना पराया कुछ भी नहीं है दोस्त जो था जो है जो रहेगा सब एक सपना है। जिसे हम अच्छा समझते थे, …

“माँ”…इंतज़ार… सी.एम्. शर्मा (बब्बू)….

    जिन नैनों से देखा तुमने आज उनमे रही ज्योत नहीं… जिन बाहों ने संभाला तुझको बची उनमें ताकत नहीं… ममता का समंदर छलकता अब भी पहले जैसा …

ये कौन सा सभ्य समाज है (भाग – तीन) – डी के निवातिया

ये कौन सा सभ्य समाज है (भाग – तीन) *** ये कौन सा सभ्य समाज है, ये किस सदी का राज़ है मानव का मानव दुश्मन, लुप्त प्राय: लोक-लाज …