मंजिलें मुकाम पाती रही हूँ।।

नज़्म।। उम्मीद के दीये जलाती रही हूँ, तूफाँ में भी कश्ती चलाती रही हूँ।। हौसले डगमगा नहीं सकते हैं मेरे, विश्वास को मन में बढ़ाती रही हूँ।। नहीं तोड़ …

जमाने ने यह कैसी करवट ली – अनु महेश्वरि

जमाने ने यह कैसी करवट ली है, शोर के बीच एक खामोशी सी है। यह कैसे वक़्त का आगाज हुआ, हर कोई यहाँ देखो नाख़ुश ही है। बैचेनी का …

जाने ये किसका दोष है – शिशिर मधुकर

ढूंढ़ते हैं हम जहाँ पे ज़िन्दगी मिलती नहीं जाने ये किसका दोष है कलियां अब खिलती नहीं पत्तियां इस पेड़ की खामोश हैं मायूस हैं जब हवा ही ना …

जब भी तुम्हारे पास आता हूँ मैं

जब भी तुम्हारे पास आता हूँ मैं कितना कुछ बदल जाता है सारी दुनिया एक बंद कमरे में सिमिट जाता है सारी संसार कितना छोटा हो जाता है मैं …

दोहे – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

धरा धधकती तपन से, है सूरज अंगार। त्राहि – त्राहि अब मच रही, बिन पानी संसार। ताल पोखर सूख गये, विलख गये सब जान हरितिमा सब झुलस रहे, गर्मी …

दोहे – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

घटता – बढ़ता चाँद है, बहुत अजब है खेल साथ सूर्य अरु चाँद का, होता कभी न मेल। नदियाँ कल – कल वह रही, झरने गाते गीत घूंघट ओढ़े …

चश्मे का नंबर बढ़ा

चश्मे का नंबर बढ़ा !! ———————————- बिन चश्मे का बचपन था हर कोई दोस्त हर कहीं अपनापन था। ज्यों-ज्यों चश्मे का नंबर बढ़ा । त्यों-त्यों सच्चाई से पर्दा हटा …

अपना – पराया – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

कवि – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु) यहाँ अपना पराया कुछ भी नहीं है दोस्त जो था जो है जो रहेगा सब एक सपना है। जिसे हम अच्छा समझते थे, …

“माँ”…इंतज़ार… सी.एम्. शर्मा (बब्बू)….

    जिन नैनों से देखा तुमने आज उनमे रही ज्योत नहीं… जिन बाहों ने संभाला तुझको बची उनमें ताकत नहीं… ममता का समंदर मगर छलकता है पहले जैसे …

ये कौन सा सभ्य समाज है (भाग – तीन) – डी के निवातिया

ये कौन सा सभ्य समाज है (भाग – तीन) *** ये कौन सा सभ्य समाज है, ये किस सदी का राज़ है मानव का मानव दुश्मन, लुप्त प्राय: लोक-लाज …

सैलाब – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

कवि – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु) हर इक शितम सैलाब से क्या कम है एक आवाज़ इंकलाब से क्या कम है। चोरी डकैती बेईमानी अपहरण आम है यहाँ बलात्कार …

तेरे नैन संग नैन मिले।।

तेरे नैन संग नैन मिले,फिर नैन हमारे चार हुए, समझी नैनों ने भाषा नैनों की,नैनों ने खुद ही जवाब दिए, शब्द मूक से मौन रहे,निशब्द हमारे भाव हुए, मन …

“माँ”…सी. एम् शर्मा (बब्बू)

  धागे प्रेम के…. कच्चे कहाँ होते हैं… देखो ‘माँ’ ड्योढ़ी पे है खड़ी… अकेली….भूखी…प्यासी…. स्थिर काया…एकटुक निहारती… वीरान सी पगडण्डी लगती है उसे… भीड़ इतनी आती जाती में …

विक्षोभ – आलोक पाण्डेय

विक्षोभ ——————– स्तब्धित दिशाएँ बेकली हवाएँ व्यथित अंबर कह रहा आज – बेहद निर्मोही , बडी निर्दयता से ‘ कैसी ‘ – मिट रही , क्यों कोई मिटा रहा …

गर्भ में सहमी सी बेटी,अपनी माँ से पूँछ रही।

गर्भ में सहमी सी बेटी,अपनी माँ से पूँछ रही। क्या गुनाह किया है मैंने, मुझे गर्भ में ही मार रहीं।। मैं तो तेरा अंश हूँ माँ, फिर भी क्यूँ …